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गांधी आश्रम के बारे में

गांधी स्मारक संग्रहालय

"गुजराती होने के नाते मैंने सोचा कि मुझे देश की महानतम सेवाओं का गुजराती भाषा के माध्यम से योग्य प्रस्तुतीरण कैसे करना चाहिए और तब अहमदाबाद हाथ करघा बुनाई का एक प्राचीन केन्द्र था, यह हाथ से कताई के कुटीर उद्योग के पुनरूद्वार के लिए सबसे अनुकूल क्षेत्र के रूप में पसंद किया जाता था। इस नगर के गुजरात की राजधानी होने के कारण इसे इसके धनवान नागरिकों से अन्य क्षेत्रों की अपेक्षा अधिक आर्थिक सहायता मिलने की आशा थी।

गांधीजी द्वारा अहमदाबाद को गतिविधियों का केन्द्र चुनने के पीछे उपरोक्त स्पष्टिकरण दिया गया था।

गांधीजी ने साबरमती नदी के किनारे उस जगह का चुनाव किया जो संत दधिची के मंदिर के साथ ही साथ जेल और शवदाह गृह के बहुत निकट था। गांधीजी अक्सर यह टिप्पणी किया करते थे कि "यह स्थल हमारी सत्य की खोज जारी रखने और एक तरफ विदेशियों की गोलियां और दूसरी तरफ मां प्रकृति की बिजलियों से निर्भरता का विकास करने के लिए उपयुक्त है।" कुछ आवश्यक संरचना बनाने के बाद 1917 में आश्रम में सभी गतिविधियां जोर-शोर से शुरू हो गई।

गांधीजी ने स्वतंत्रता और साथ ही साथ समाज के उत्थान की सभी प्रमुख गतिविधियों का संचालन इसी आश्रम से किया, जोकि विख्यात रूप से साबरमती आश्रम के रूप में जाना जाता था। अंत में, 12 मार्च 1930 को नमक कानून को तोड़ने के लिए दांडी यात्रा के लिए रवाना होने से पहले वह इस आश्रम में कई वर्षों तक रहे। दांडी से यात्रा शुरू करने से पहले गांधी जी ने घोषणा की थी कि वे इस आश्रम में देश की स्वतंत्रता से पहले नहीं लोटेंगे।

गांधी स्मारक संग्रहालय 1951 में स्थापित सार्वजनिक ट्रस्ट द्वारा चलाया जाता है। संग्रहालय का नया भवन 1963 में बनाया गया था। संग्रहालय का मुख्य उद्देश्य महात्मा गांधी के निजी स्मरणीय वस्तुओं को एक घर में रखना था। फलस्वरूप प्रदर्शित किया जाने वाला सामान गांधी जी के जीवन के ऐतिहासिक घटनाओं के विविध रूपों को दर्शाता है। यहां पर पुस्तकें, पांडुलिपियां, और पत्राचार की फोटो प्रतिलिपियां, गांधीजी के उनकी पत्नी के साथ फोटो, और आश्रम के अन्य सहयोगियों के साथ, आदम कद के तैलिय पेंटिंग और वास्तविक निशानी जैसे कि लिखने का डेस्क और कातने वाला चरखा रखा गया है।